राजगढ़, जिले के पचोर और बोड़ा थाना क्षेत्र ऐसे हैं, जहां प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर की पुलिस चोरी के मामलों में अपराधियों की तलाश करने आती रहती है। वजह यह है कि इन थाना क्षेत्र में युवाओं के साथ आधा दर्जन गांव के (बाल- अपचारी) नाबालिगों से चोरी कराने की घटनाओं को अंजाम दिया जाता स्वयंसेवी संस्थाओं की जांच में सामने आया है। दरअसल, दूर-दराज के जिलों से ऐसे नाबालिग बच्चों को पकड़कर चोरी करने की ट्रेनिंग दी जाती है। पकड़े गए कुछ बच्चों ने यह बात कबूल की। पुलिस की तफ्तीश शुरू ईसे चौकाने वाला पहलू यह निकला कि इन बच्चों पर अपना हक जताने वाले माता-पिता भी फर्जी निकले। असली माता-पिता कौन है. यह उजागर नहीं हो सका है। लिहाजा, चोरी की घटनाओं में लिप्त मिले ऐसे 22 बच्चों का महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा डीएनए टेस्ट कराने के लिए सैम्पल हैदराबाद भेजे गए हैं, लेकिन रिपोर्ट दो साल बाद भी नहीं मिल सकी। विभाग ने तीन बार रिमाइंडर भी किए है। पापणारगररागारमा अब कर दिया जाता है मना- अब जब नए मामलों में डीएनए टेस्ट की बात कही जाती है तो विभाग यह कहकर टाल देता है कि रिपोर्ट आने में समय लगता हा इसलिए सैम्पल नहीं भेजे जा रहा। सन्क लन किया जानाजाका नजाने जाने बच्चे ने कबूल किया महिला दे रही ट्रेनिंग पिछले दिनों मिले ऐसे कई सबूतों के बाद कहीं न कहीं यह देखने को मिला कि इन गांवों में बाहर से बच्चे लाकर उन्हें चोरी की ट्रेनिंग देकर आपराधिक गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है। मामला उस समय और भी साफ हो गया, फरवरी 2018 में खद एक बच्चा गांव से भागकर आया और उसने पुलिस को बताया कि एक महिला उसे चोरी की ट्रेनिंग दे रही थी। पुलिस ने पहले अनसुना किया, जब मामला मीडिया में आया तो कोतवाली में केस दर्ज किया गया। पर अपने माता-पिता होने का हक जताने वाले लोग दस्तावेज जुटाकर उन्हें ले आए। अब ऐसे में विभाग या समाजसेवी संस्थाओं के पास सिर्फ डीएनए रिपोर्ट ही सहारा है।
राजगढ़, जिले के पचोर और बोड़ा थाना क्षेत्र ऐसे हैं, जहां प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर की पुलिस चोरी के मामलों में अपराधियों की तलाश करने आती रहती है। वजह यह है कि इन थाना क्षेत्र में युवाओं के साथ आधा दर्जन गांव के (बाल- अपचारी) नाबालिगों से चोरी कराने की घटनाओं को अंजाम दिया जाता स्वयंसेवी संस्थाओं की जांच में सामने आया है। दरअसल, दूर-दराज के जिलों से ऐसे नाबालिग बच्चों को पकड़कर चोरी करने की ट्रेनिंग दी जाती है। पकड़े गए कुछ बच्चों ने यह बात कबूल की। पुलिस की तफ्तीश शुरू ईसे चौकाने वाला पहलू यह निकला कि इन बच्चों पर अपना हक जताने वाले माता-पिता भी फर्जी निकले। असली माता-पिता कौन है. यह उजागर नहीं हो सका है। लिहाजा, चोरी की घटनाओं में लिप्त मिले ऐसे 22 बच्चों का महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा डीएनए टेस्ट कराने के लिए सैम्पल हैदराबाद भेजे गए हैं, लेकिन रिपोर्ट दो साल बाद भी नहीं मिल सकी। विभाग ने तीन बार रिमाइंडर भी किए है। पापणारगररागारमा अब कर दिया जाता है मना- अब जब नए मामलों में डीएनए टेस्ट की बात कही जाती है तो विभाग यह कहकर टाल देता है कि रिपोर्ट आने में समय लगता हा इसलिए सैम्पल नहीं भेजे जा रहा। सन्क लन किया जानाजाका नजाने जाने बच्चे ने कबूल किया महिला दे रही ट्रेनिंग पिछले दिनों मिले ऐसे कई सबूतों के बाद कहीं न कहीं यह देखने को मिला कि इन गांवों में बाहर से बच्चे लाकर उन्हें चोरी की ट्रेनिंग देकर आपराधिक गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है। मामला उस समय और भी साफ हो गया, फरवरी 2018 में खद एक बच्चा गांव से भागकर आया और उसने पुलिस को बताया कि एक महिला उसे चोरी की ट्रेनिंग दे रही थी। पुलिस ने पहले अनसुना किया, जब मामला मीडिया में आया तो कोतवाली में केस दर्ज किया गया। पर अपने माता-पिता होने का हक जताने वाले लोग दस्तावेज जुटाकर उन्हें ले आए। अब ऐसे में विभाग या समाजसेवी संस्थाओं के पास सिर्फ डीएनए रिपोर्ट ही सहारा है।

