ब्यावरा. अतिवृष्टि से कम हुई सोयाबीन की पैदावार का नुकसान उठा रहे अन्नदाता को भाय ने भी रुला दिया है। दिवाली के आसपास मंडियों में उपज लेकर पहुंचे किसानों को औने-पौने दाम ही मिल पाए। अब आवक आधी से भी कम हो गई और किसानों के पास लगभग रीत चकी है. तब जाकर सोयाबीन का भाव 4400 के पार पहुंच गया है। निकालाजासकता है कि बिचौलियों और दलालों के दौर में किसानों को उपज के सही दाम मिल ही नहीं पाते हैं। हर बार उस वक्त भाव बढ़ जाते है जब किसानों के पास उपज होती ही नहीं है। शुरुआत में सोयाबीनका भाव 2300 से 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक रहा। उस दौरान गीली और दागी सोयाबीन होने से किसानों को मजबरनबेचना पड़ा। उसदौरान अच्छी क्वालिटी की सोयाबीन भी तीन हजार के पार नहीं पहुंच पाई। इससे किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ी है। प्रति बीघा में किसानों को लागत मूल्य भी नहीं निकला है। बड़ा सवाल: कोई नहीं करता भाव की बात? राजनीतिक दल, संगठन और खुद को किसानों की हितेषी बताने वाली सरकारें भी कभी उपज के दाम को लेकर बात नहीं करते। पीएम खेती को लाभ का धंधा बनाने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत में उन्हें हमेशा ही उनकी ही उपज के दाम सही नहीं मिल पाते। वहीं, अन्य राजनीतिक दल तो चुनावी सब्ज बाग किसानों को दिखाते हैं वे भी पूरे नहीं हो पाते। ऐसे में सिर्फ चुनावी घोषणाओं और सभाओं को संबोधित करने तक ही किसान हितेषी योजनाएं रह गई है। बीमा मिला नहीं, मुआवजा नामका पहले बारिश फिर भाव की मार झेल रहे किसान शासन स्तर पर भी कदम-कदम पर छले गए हैं। उन्हें खराब उपज का बीमा अभी तक नहीं मिल पाया वहीं, राज्य शासन की ओर से दिया गया बीमा भी नाकाफी है। नुकसान का 25 प्रतिशत बीमा उक्त उपज का लागत भी नहीं दे पा रहा है। अब उन्हें यूरिया के लिए परेशान होना पड़ रहा है, जिसको सीधा असर गेहूं की पैदावार पर पड़ना तय है।
ब्यावरा. अतिवृष्टि से कम हुई सोयाबीन की पैदावार का नुकसान उठा रहे अन्नदाता को भाय ने भी रुला दिया है। दिवाली के आसपास मंडियों में उपज लेकर पहुंचे किसानों को औने-पौने दाम ही मिल पाए। अब आवक आधी से भी कम हो गई और किसानों के पास लगभग रीत चकी है. तब जाकर सोयाबीन का भाव 4400 के पार पहुंच गया है। निकालाजासकता है कि बिचौलियों और दलालों के दौर में किसानों को उपज के सही दाम मिल ही नहीं पाते हैं। हर बार उस वक्त भाव बढ़ जाते है जब किसानों के पास उपज होती ही नहीं है। शुरुआत में सोयाबीनका भाव 2300 से 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक रहा। उस दौरान गीली और दागी सोयाबीन होने से किसानों को मजबरनबेचना पड़ा। उसदौरान अच्छी क्वालिटी की सोयाबीन भी तीन हजार के पार नहीं पहुंच पाई। इससे किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ी है। प्रति बीघा में किसानों को लागत मूल्य भी नहीं निकला है। बड़ा सवाल: कोई नहीं करता भाव की बात? राजनीतिक दल, संगठन और खुद को किसानों की हितेषी बताने वाली सरकारें भी कभी उपज के दाम को लेकर बात नहीं करते। पीएम खेती को लाभ का धंधा बनाने का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत में उन्हें हमेशा ही उनकी ही उपज के दाम सही नहीं मिल पाते। वहीं, अन्य राजनीतिक दल तो चुनावी सब्ज बाग किसानों को दिखाते हैं वे भी पूरे नहीं हो पाते। ऐसे में सिर्फ चुनावी घोषणाओं और सभाओं को संबोधित करने तक ही किसान हितेषी योजनाएं रह गई है। बीमा मिला नहीं, मुआवजा नामका पहले बारिश फिर भाव की मार झेल रहे किसान शासन स्तर पर भी कदम-कदम पर छले गए हैं। उन्हें खराब उपज का बीमा अभी तक नहीं मिल पाया वहीं, राज्य शासन की ओर से दिया गया बीमा भी नाकाफी है। नुकसान का 25 प्रतिशत बीमा उक्त उपज का लागत भी नहीं दे पा रहा है। अब उन्हें यूरिया के लिए परेशान होना पड़ रहा है, जिसको सीधा असर गेहूं की पैदावार पर पड़ना तय है।

